मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

दादारी से बाबारी बोल रही हुँ

 मैं बाबरी मस्जिद कहलाती हूँ बाबर तो मेरे आसपास गुज़रा नहीं मुझे बताया गया बाबर के एक सेनापति मीर बाक़ी मुझे बनवाया था. लोग मुझमें आते रहे मैं उन्हें शांति देती रही. अब मैं देश के शांतिप्रिय सौहार्द प्रिय न्याय प्रिय लोगों के दिल में रहती हूँ और हमेशा रहूंगी. संसार में चरअचर कुछ भी सदैव नहीं रहने वाला लेकिन कुछ चीज़ें कभी नहीं मरतीं,वे सदियों सदियों तक विस्मृतियों में जीवित रहतीं हैं. क्या करबला में कोई यज़ीद हज़रत हुसैन को मार पाया?हुसैन तो आज भी जीवित हैं. क्या भारत में कोई गोडसे गांधी को मार पाया?ये सब तो पहले से भी अधिक शक्तिशाली हो गए हैं. ठीक इसी प्रकार मेरा अस्तित्व भी अब मिटने वाला नहीं है. कभी अतीत में जब झांकती हूँ तो याद आता है सैकड़ों साल से गुमनाम पड़े मेरे अस्तित्व पर पहली गिद्ध दृष्टि देश को दो सौ साल तक गुलाम बनाये रखने वाले अंग्रेजों की पड़ी. मुझे सियासत में लाये जाने का श्रेय मैं उन्हें ही देती हूँ. दीर्घ कालीन तक राजसत्ता के लिए उन्हें बांटो और राज करो की नीति को अंजाम देना ही था. मेरा इस्तेमाल कुछ इस तरह से किया गया कि मैं ग़ुलामी की प्रतीक हूँ, मेरा अस्तित्व राम के मंदिर को तोड़कर आया है. अंग्रेजों की लाखों बातों को झूठ का पुलिंदा मानने वाले कुछ संकीर्ण मस्तिष्कों को पता नहीं कैसे ये बात जम गई.
मेरा नाम बाबरी मस्जिद है, मुझे ये नाम जिसके नाम पर दिया गया, उसने कभी हिंदू मुसलमानों को लड़ाने की बात नहीं की. गाय तक की सुरक्षा की वसीयत की. मीर बाकी से ऐसा कृत्य क्यों करवाता. फिर लगा अकबर जैसे सहिष्णु शासक से यह सब कैसे देखा जाता. रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसी दास अपने अराध्य राम के लिए अपने सखा अब्दुरर्हीम ख़ानख़ाना से जो अकबर के प्रमुख सेनापति थे कोई शिकायत क्यों नहीं की. मैं अपने अतीत में झांकती हूँ तो मुझे लगता है कि, यदि मैं सन् 1947से पहले गिरा दी गई होती तो इसका कारण अंग्रेजों को मान लेती कि उनके कुचक्रों ने एक समुदाय से यह कृत्य करवा कर अपने कुत्सित मनसूबे पूरे किये होंगे. यदि मुझ पर स्वतंत्रता के बाद अरीब करीब आघात होता तो मैं समझ लेती देश में विभाजन की विभीषिका के चलते दो समुदायों के परस्पर वैमनस्य में मेरी बलि चढ़ा दी गई. स्वतंत्रता के बाद भी ऐसा होता तो मान लेती कि बहुसंख्यक समुदाय ने अतिवादी रवैया अपनाते हुए ऐसा किया. आज़ादी के बाद सोमनाथ के कलश संवारे गए, लेकिन मेरे साथ कुछ नहीं घटा. हां कुछ मूर्तियाँ रखकर मुझपर प्रश्नचिन्ह लगाये गए लेकिन मैं न्याय से आश्वस्त रही. ये घटना 1965में घटती तो मैं मान लेती कि पाकिस्तान के हमले से हिन्दू जनमानस व्यथित था. लेकिन 6दिसम्बर 1992ऐसा कौन सा कालखंड था, जो मेरे अस्तित्व पर भारी पड़ गया.
कुछ चिंतको की राय में मुस्लिम तुष्टीकरण का कुत्सित प्रचार मुझ पर भारी पड़ा. कुछ ने मंडल कमंडल की राजनीति को जिम्मेदार बताया. लेकिन मेरा आकलन है कि ये सबकुछ इस देश की दिशाहीन राजसत्ता पिपासु राजनीति के चलते एक षडयंत्र के रूप में हुआ. देश को ये सन्देश दिया गया कि सांप्रदायिक धर्मोन्मादी अब खुलकर अपना घिनौना खेल खेलेंगी. उन्हें अब विस्तार चाहिए भले ही उनके मार्ग की बाधा कोई भी हो.
इस दिन संविधान रचयिता बाबा साहब का परिनिर्वाण दिवस है .संविधान को धत्ता बताकर इसकी मर्यादा तार तार की गई. राजनैतिक व्यवस्था का मखौल उड़ा. कानून का राज होने का दम्भ टूटा. न्याय पालिका पर सवालिया निशान लगे. सामाजिक सद्भाव को आग लगाई गई. मीडिया कटघरे में खड़ा हुआ. वो सब कुछ हुआ जो इस देश में पहले कभी नहीं हुआ था.
भारतीय मुस्लिम के मस्तिष्क पटल पर दो घटनाओं ने अमिट छाप छोड़ी है. एक हज़ारों वर्ष पूर्व की कत्ले हुसैन की करबला की घटना और दूसरी बाबरी विध्वंस. मैं बाबरी मस्जिद सबकुछ देख रही हूं, सांप्रदायिकता के दानव को इतराते हुए, सहिष्णुता के संकट की गुहार लगाते हुए बुद्धिजीवियों कलमकारों कलाकारों और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए समर्पित लोगों को. मैंने दादरी को भी अपने आप से जोड़ लिया है. आखिर वो भी तो मेरे सफर का एक पड़ाव है. 6दिसम्बर प्रति वर्ष आता है, बाबा साहब का परिनिर्वाण दिवस है,जो करोड़ों भारतीयों के मुक्तिदाता और प्रेरणा स्रोत हैं. इस दिवस को मेरी इस पीड़ा के बहुत सारे अर्थ निकलते हैं. आने वाली पीढ़ीयां इसका विश्लेषण अवश्य करेंगी. पता नहीं इस देश की राजनीति मुझसे कुछ सीखने को तैयार है या नहीं.

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